Kabir Ji Best 10 Dohe in Hindi

Kabir Ji Best 10 Dohe in Hindi || कबीर जी के 10 क्रन्तिकारी दोहे – गागर में सागर

Kabir Ji Best 10 Dohe in Hindi || कबीर जी के 10 क्रन्तिकारी दोहे: वैसे तो कबीर के नाम से शायद ही कोई अछूता होगा । कबीरवाणी, कबीर दोहे और कबीर के गीत बहुत ही प्रसिद्द है, जो मानव को सरल शब्दों में अपने ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग बताते है । आज मै आपको ऐसे ही कुछ बहुत प्रसिद्द दोहो के करीब लाया हूँ। Kabir Ji Best 10 Dohe in Hindi पोस्ट में दोहो का हिंदी में अर्थ और भावार्थ दोनों दिए गए है, जिससे आपको दोहो को समझने में आसानी होगी । कबीर जी एक छोटे से दोहे के माध्यम से बहुत बड़ी सीख दे जाते है।

आइये पहले जानते है कि आखिर कौन थे कबीर?

कबीर जी को कबीर दास के नाम से जाना जाता है | ये 15वी शताब्दी के कवि या कहे की संत थे | किस धर्म से थे ये साफ़ साफ़ नहीं कहा जा सकता | कबीर जी के धर्म को लेकर लोगो के बीच अलग अलग मत है | यदि आप विकिपीडिआ पर पढ़ेंगे तो उसके अनुसार वो मुस्लिम थे और बड़े होकर हिन्दू संत से प्रभावित हो गए | यदि आप कबीर को थोड़ा गहरे उतर कर पढ़ेंगे, तो पाएंगे की वो किसी भी धर्म को नहीं मानते थे | कबीर जी के दोहे और भजन सीधा दिल को छूते है और मनुष्य को ईश्वर को जानने की तरफ मोड़ते है और भी बहुत कुछ है कबीर जी के बारे में बताने को लेकिन यही विराम देते है |

आइये अब हम कबीर जी के उन 10 दोहो के बारे में जानते है, जिन्हे पढ़ने के बाद आप इस भागम भाग की दुनिया से इतर थोड़ा रुकेंगे और अपने अंदर झाकेंगे |

Kabir Ji Best 10 Dohe in Hindi with Meaning

अर्थ: चलती हुई चक्की (जो कि पुराने समय में ग्रामीण महिलाओ के द्वारा इस्तमाल कि जाती थी) को देख कर कबीर रोने लगते है कि दोनों पाटो के बीच में कुछ भी सही सलामत नहीं बचता।
भावार्थ: कबीर जी इस दोहे के माध्यम से जीवन कि गहरी सच्चाई बताना चाह रहे है, कबीर जी को रोना आ रहा है यह देख कर कि इस संसार रूपी चक्की में, जिसके पृथ्वी और आकाश दो पाट है, मनुष्य अपना पूरा जीवन बिता देता है लेकिन अपने आप को नहीं जान पाता और अपना पूरा जीवन सांसारिक चीजों को पाने में लगा देता है और अंत में सब कुछ यही छोड़ कर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

अर्थ: माली को आता देख कर कलियाँ आपस में बात कर रही है, माली ने आज फूलो को चुन लिया है, अब कल जब हम फूल बनेंगे तो हमें भी तोड़ कर ले जायेगा ।
भावार्थ: कबीर जी ने इस दोहे में बड़े सरल शब्दों में जीवन और मृत्यु को दर्शाया है । कबीर जी कहना चाह रहे है कि अपने कर्मो पर ध्यान दो, अपने अंदर के ईश्वर को जानो। कलियों के माध्यम कबीर जी उन जीवित प्राणियों को सावधान कर रहे है, जो रोज अपने आसपास के लोगो को मरता हुआ देख रहे है। वो कह रहे है समय रहते इस बात को जान जाओ कि आगे बारी तुम्हारी है।

अर्थ: इस दोहे का अर्थ है कि जैसे तिल के अंदर तेल होता है और चकमक पत्थर में आग होती है उसी तरह तेरा ईश्वर तुझमे है इस सच्चाई को जान जा ।
भावार्थ: कबीर जी ने ईश्वर कि सच्चाई छोटे से दोहे के माध्यम से हमें बता दी है । कबीर जी कहते है जैसे तिल में तेल दिखता नहीं, लेकिन होता है, जैसे चकमक में आग दिखती नहीं, होती है उसी तरह मानव, तेरा ईश्वर तेरे भीतर ही है इस बात को जान सकता है तो जान लें। । इतने साफ़ और सरल शब्दों में मनुष्य को ईश्वर कि परिभाषा सिर्फ कबीर ही बता सकते है।

अर्थ: इस दोहे का अर्थ है कि समय रहते ईश्वर को नहीं जाना और समय को गवां दिया । अंत में पछताने से कुछ नहीं होगा जैसे चिड़िया के खेत चुग जाने के बाद कुछ नहीं किया जा सकता ।
भावार्थ: इस दोहे के माध्यम से कबीर जी उन लोगो को आगाह कर रहे है जिनके पास प्रभु को जानने का वक्त है लेकिन वो समय को गवां रहे है । कबीर जी कहना चाह रहे है कि जब तक सबल है, जब तेरे पास सब साधन है उसी समय अपने अंदर बैठे ईश्वर को जान ले वर्ना अंत काल में, जब मृत्यु निकट होगी, तब समय को गवाने का पछतावा होगा कि जीवन रहते मैंने ईश्वर को क्यों नहीं जाना। कबीर जी इसके लिए सुन्दर उदाहरण देते हुए कह रहे है कि जैसे चिड़िया के दाना चुगने के कारण खेत कि फसल नष्ट हो जाती है, फिर पछताने से कुछ भी वापिस मिलने वाला नहीं है ।

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अर्थ: मिटटी कुम्हार से कह रही है कि तू मुझे क्या रोंद रहा है । एक दिन ऐसा आएगा जब मै तुझे रौंदूंगी ।
भावार्थ: कबीर जी इस दोहे के माध्यम से मनुष्य को समझा रहे है कि अहंकार नहीं करना चाहिए क्योकि समय कब करवट ले ले कोई नहीं जानता। आज जो धनवान है वो कल कंगाल हो जायेंगे, जो कंगाल है वो धनवान हो जायेंगे। आज जो घमंड में चूर है कुछ समय बाद मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे । कबीर इस बात को समझने के लिए कुम्हार और मिटटी का उदाहरण दे रहे है ।

अर्थ: दोहे का अर्थ है कि यदि मन साफ़ नहीं है तो शरीर को साफ़ करने का कोई फायदा नहीं है जैसे मछली हमेशा पानी में रहती है लेकिन उसके शरीर कि बदबू नहीं जाती ।
भावार्थ: कबीर जी कह रहे है अपने भीतर किसी भी तरह का छल कपट मत रखो क्योकि बाहर से चाहे आप कितना भी दान पुण्य करे लेकिन यदि आपका मन दुसरो का बुरा चाहता है या दुसरो कि भलाई नहीं चाहता तो ऐसे दान पुण्य से आपको कोई लाभ नहीं होगा। नदियों में नहाने से पाप नहीं धुलत। कबीर जी उदाहरण के माध्यम से कह रहे है जैसे मछली जल में रहने के बाद भी अपनी बदबू नहीं मिटा सकती उसी तरह नहाने से मनुष्य अपने किये हुए बुरे कर्मो को नहीं मिटा सकता।

अर्थ: इस दोहे का हिंदी में अर्थ है कि जो इस दुनियां में आया है उसे एक दिन जरूर जाना है। चाहे राजा हो या फ़क़ीर, अंत समय यमदूत सबको एक ही जंजीर में बांध कर ले जायेंगे।
भावार्थ: कबीर जी कह रहे है मृत्यु निश्चित है हर एक उस जीवात्मा कि जिसने जन्म लिया है । चाहे राजा हो, गरीब हो या फ़क़ीर हो सबका मरना निश्चित है। कबीर कहते है हो सकता है कोई सिंघासन पर और कोई जंजीर में बंध कर मृत्यु सैय्या तक जाए लेकिन अंत में सबको एक ही जगह जाना है । कबीर समझा रहे है कि ये घमंड, अहंकार छोड़ कर ईश्वर में मन लगाओ ।

अर्थ: इस दोहे का अर्थ है हे मन सब कुछ धीरे धीरे घटता है जैसे माली द्वारा सौ घड़े पानी देने के बाद भी वृक्ष में फल मौसम के आने पर ही होते है।
भावार्थ: कबीर जी बड़े सरल शब्दों में मानव को धीरज धरने का महत्व समझा रहे है । कबीर जी इस दोहे के माध्यम से मन को कह रहे है कि हे मन अधीर मत हो, धीरज रख। जीवन में एकाएक कुछ नहीं मिलता सब कुछ समय आने पर ही घटित होता है । कबीर जी ने कितना सुन्दर उदाहरण दिया है वो कहते है बगीचे का माली चाहे सौ घड़े पानी भी क्यों न दे दे किसी वृक्ष को लेकिन तब तक उस वृक्ष में फल नहीं आते जब तक कि अनुकूल मौसम ना आ जाये।

अर्थ: इस दोहे का अर्थ है जिन्होंने खोजा उन्होंने गहरे पानी में जाकर पा लिया और मै बेचारा डूबने के डर से किनारे पर ही बैठा रह गया ।
भावार्थ: कबीर जी इस दोहे के माध्यम से कहना चाह रहे है यदि तुम ईश्वर को पाना चाहते हो, तो तुम्हे दिखावा छोड़ कर सही मायने में अपने अंदर जाना पड़ेगा। जैसे किनारे पर बैठा व्यक्ति पानी के अंदर से मूल्यवान वस्तुए नहीं पा सकता उसी प्रकार सिर्फ बाहरी आडम्बरो से ईश्वर को नहीं पाया जा सकता।

अर्थ: जैसे ज्यादा बारिश भी अच्छी नहीं होती और ना ही ज्यादा धुप अच्छी होती है उसी तरह ना ही अधिक बोलना अच्छा होता है ना ही अधिक चुप रहना अच्छा होता है।
भावार्थ: कबीर जी कह रहे है कि मानव को सयंम बरतना चाहिए क्योकि किसी भी भाव कि अधिकता दुःख का कारण बनती है । कबीर जी ने सरल भाषा में जीवन को जीने का तरीका बताया है।

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